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Sunday, 10 August 2014
तुझसे मिलने को कभी हम जो मचल जाते / फ़राज़
तुझसे मिलने को कभी हम जो मचल जाते हैं
Saturday, 31 May 2014
KARMVEER
A beautiful poem by famous Hindi poet Ayodhya Singh Upadhyay “Hariaudh”.
देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं
रह भरोसे भाग के दुख भोग पछताते नहीं
काम कितना ही कठिन हो किन्तु उबताते नहीं
भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं
हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले
सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले ।
आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही
सोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वही
मानते जो भी हैं सुनते हैं सदा सबकी कही
जो मदद करते हैं अपनी इस जगत में आप ही
भूल कर वे दूसरों का मुँह कभी तकते नहीं
कौन ऐसा काम है वे कर जिसे सकते नहीं ।
जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं नहीं
काम करने की जगह बातें बनाते हैं नहीं
आज कल करते हुये जो दिन गंवाते हैं नहीं
यत्न करने से कभी जो जी चुराते हैं नहीं
बात है वह कौन जो होती नहीं उनके लिये
वे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिये ।
व्योम को छूते हुये दुर्गम पहाड़ों के शिखर
वे घने जंगल जहां रहता है तम आठों पहर
गर्जते जल-राशि की उठती हुयी ऊँची लहर
आग की भयदायिनी फैली दिशाओं में लपट
ये कंपा सकती कभी जिसके कलेजे को नहीं
भूलकर भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं ।
देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं
रह भरोसे भाग के दुख भोग पछताते नहीं
काम कितना ही कठिन हो किन्तु उबताते नहीं
भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं
हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले
सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले ।
आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही
सोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वही
मानते जो भी हैं सुनते हैं सदा सबकी कही
जो मदद करते हैं अपनी इस जगत में आप ही
भूल कर वे दूसरों का मुँह कभी तकते नहीं
कौन ऐसा काम है वे कर जिसे सकते नहीं ।
जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं नहीं
काम करने की जगह बातें बनाते हैं नहीं
आज कल करते हुये जो दिन गंवाते हैं नहीं
यत्न करने से कभी जो जी चुराते हैं नहीं
बात है वह कौन जो होती नहीं उनके लिये
वे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिये ।
व्योम को छूते हुये दुर्गम पहाड़ों के शिखर
वे घने जंगल जहां रहता है तम आठों पहर
गर्जते जल-राशि की उठती हुयी ऊँची लहर
आग की भयदायिनी फैली दिशाओं में लपट
ये कंपा सकती कभी जिसके कलेजे को नहीं
भूलकर भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं ।
Sunday, 3 November 2013
Diwali
दीयों की लड़ियों से सजे दरवाजे पर
किसी ने दस्तक दी
दरवाज़ा खोला तो ख़ुशी चुपचाप खड़ी थी
मैंने अपने पांच दीयों की रौशनी में देखा
दो दिए उसकी डबडबाई आँखों में जल रहे थे
शायद उसे मेरे घर के रास्ते में
कई घरों में अँधेरे मिले होंगे
उसे देख कर मैंने सोचा मेरी ख़ुशी
इतनी उदास नहीं हो सकती
और न तो मैं इतना सीमित
मैंने अपने घर के पांच दीयों में से
दो दिए उठाये
और अँधेरे में डूबे दो दरवाज़ों पे रख दिया
मेरे दरवाज़े पे खड़ी ख़ुशी के चेहरे पर
मुस्कान आ गयी , थोड़ी सी सही
- अनिल
Sunday, 15 September 2013
बस यूँ ही
जब भी शाम गहराती है
तेरी याद आ जाती है... बस यूँ ही
मेरा कोई इरादा नहीं होता
फिर भी सता जाती है ... बस यूँ ही
तेरे मुरीद हम नहीं हैं
हक अपना जताती है ... बस यूँ ही
लाख कर लूँ बंद दरवाजे दिल के
चुपके से घर बना जाती है ... बस यूँ ही
तेरे हाथों में खंजर तो नहीं दिखता
मैं फ़ना हो जाता हूँ ... बस यूँ ही
दिल की लगी को दिल्लगी समझते हो
कभी दिल भी लगाओ ... बस यूँ ही
कब से साकी बने बैठे हो
कभी शराब भी बन जाओ ... बस यूँ ही
Friday, 6 September 2013
KENCHUL (THE MOULT)
जन्म से ही चढ़ने लगी केंचुल
एक के ऊपर एक
चमकदार और पारदर्शी
प्रफुल्लित हो नाच उठता, मैं
गर्व से इठलाता हुआ
सीना चौड़ा किये खुश होता
अपने हर नए आवरण के साथ
सत्य से दूर होता गया
जैसे जैसे मेरे ऊपर चढ़ती गयीं
केंचुल की परतें
मेरे चारों ओर लोग ताली बजाते हैं
तालियाँ तेज़ हो जाती हैं
मेरे हर नयी केंचुल के साथ
भीड़ का हिस्सा बना, मैं खड़ा देखता जाता हूँ
अपने रंग को बदलता हुआ
उस भीड़ की तरह जो खड़ी ताली बजा रही है
मेरे ऊपर चढ़ती हर एक नयी केंचुल को देखकर
जो केंचुल कभी पारदर्शी थी
वो अब मटमैली हो चुकी है
इतनी परतों के बाद
बाधित कर देती है, मेरी दृष्टि
और मैं असमर्थ पाता हूँ
कुछ भी स्पष्ट देख सकने में
केंचुल के पार
एक नहीं कई केंचुल हैं
एक के ऊपर एक
उतारा है कुछ केंचुलों को मैंने
लेकिन अब भी अनभिज्ञ हूँ
अपने सत्य से
व्यग्र हो उठता है मन
तड़पता है निकल आने को बाहर
इन केंचुलों के कारागार से
इस घुटन से दूर चाहता है उड़ना
उन्मुक्त आकाश में
केंचुलों की परिधि से परे
जानने को सत्य, जो छुपा है
उतार रहा हूँ
एक के बाद एक अपनी केंचुल को
उस दीवार के पत्थरों से रगड़ रगड़ के
जो ताली बजाते लोगों ने खड़ी की है
लेकिन शायद वो खुश नहीं हैं
लहूलुहान हो जाता हूँ मैं
कुछ अपनी रगड़ से
और कुछ उनके पत्थरों से
जो अब तक ताली बजा रहे थे
आसानी से छूटती नहीं है ये केंचुल
जिसने जमा ली हैं जड़ें मेरे भीतर तक
अधमरा लेटा रहता हूँ
घाव भरने के इंतज़ार में
फिर तैयार होता हूँ, मैं
एक और केंचुल की परत, उतारने के लिए
Sunday, 13 January 2013
EK AUR LAU BUJH GAYI
After horrific rape incident in Delhi wanted to show my grief and pain. This poem is an effort to look inside our hearts and ask some questions.
एक और लौ बुझ गयी मैं बस देखता रहा
बाहर से चुप खड़ा था अन्दर से चीखता रहा
अनजाने डर ने बाँध दिए थे मेरे कदम
कायरता से मेरा साहस व्यर्थ में लड़ता रहा
कोई तो आ जाएगा उस खून से लथपथ के पास
सोचकर यही मैं अपने रास्ते बढ़ता रहा
एक और लौ बुझ गयी मैं बस देखता रहा
बाहर से चुप खड़ा था अन्दर से चीखता रहा
उन दम तोड़ती साँसों की मद्धम आवाज़
मेरे बहरेपन में कहीं गुम हो गयी
छटपटाता देख उसको यूँ सड़क के किनारे
मेरी आँखों का पर्दा और भी गहराता रहा
एक और लौ बुझ गयी मैं बस देखता रहा
बाहर से चुप खड़ा था अन्दर से चीखता रहा
अब पिघलता ही नहीं सामने हो कोई भी मंज़र
दिल को अपने किस कदर मैं पत्थर बनाता रहा
अपनी नज़रों में गिरने पे होती नहीं शर्मिंदगी
इंसान कैसा बन गया हूँ सवाल ये दोहराता रहा
एक और लौ बुझ गयी मैं बस देखता रहा
बाहर से चुप खड़ा था अन्दर से चीखता रहा
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