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Sunday, 15 September 2013

बस यूँ ही

 

जब भी शाम गहराती है

तेरी याद आ जाती है... बस यूँ ही

मेरा कोई इरादा नहीं होता

फिर भी सता जाती है ... बस यूँ ही

तेरे मुरीद हम नहीं हैं

हक अपना जताती है ... बस यूँ ही

लाख कर लूँ बंद दरवाजे दिल के

चुपके से घर बना जाती है ... बस यूँ ही

 

तेरे हाथों में खंजर तो नहीं दिखता

मैं फ़ना हो जाता हूँ ... बस यूँ ही

दिल की लगी को दिल्लगी समझते हो

कभी दिल भी लगाओ ... बस यूँ ही

कब से साकी बने बैठे हो

कभी शराब भी बन जाओ ... बस यूँ ही

 

 

 

 

 

Sunday, 11 November 2012

QAID (IMPRISONMENT)

किस कैद में जकड़ता जा रहा हूँ

मैं खुद से ही बिछड़ता जा रहा हूँ

जो ओझल हो गए आँखों से

उन ख्वाबों को पकड़ता जा रहा हूँ

 

दुनिया के सामने फ़ैलने की चाह में

कितना खुद में सिमटता जा रहा हूँ

मुठ्ठी भर ख़ुशी पर हक क्या जता दिया   

दर्द से रिश्ता बनाता जा रहा हूँ 

 

एक दिन तो फूल मिलेंगे राहों में

बस यूँ ही पत्थर हटाता जा रहा हूँ

तुम्हारा ये कहना कि आओगे लौटकर

साँसों से भी रिश्ता निभाता जा रहा हूँ