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Sunday, 10 August 2014
तुझसे मिलने को कभी हम जो मचल जाते / फ़राज़
तुझसे मिलने को कभी हम जो मचल जाते हैं
Sunday, 15 September 2013
बस यूँ ही
जब भी शाम गहराती है
तेरी याद आ जाती है... बस यूँ ही
मेरा कोई इरादा नहीं होता
फिर भी सता जाती है ... बस यूँ ही
तेरे मुरीद हम नहीं हैं
हक अपना जताती है ... बस यूँ ही
लाख कर लूँ बंद दरवाजे दिल के
चुपके से घर बना जाती है ... बस यूँ ही
तेरे हाथों में खंजर तो नहीं दिखता
मैं फ़ना हो जाता हूँ ... बस यूँ ही
दिल की लगी को दिल्लगी समझते हो
कभी दिल भी लगाओ ... बस यूँ ही
कब से साकी बने बैठे हो
कभी शराब भी बन जाओ ... बस यूँ ही
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