Sunday, 10 August 2014
तुझसे मिलने को कभी हम जो मचल जाते / फ़राज़
तुझसे मिलने को कभी हम जो मचल जाते हैं
Saturday, 2 August 2014
BAAD MUDDAT UNHE DEKHKAR YUN LAGA/ ALI SARDAR ZAFARI
बाद मुद्दत उन्हें देख कर यूँ लगा
जैसे बेताब दिल को क़रार आ गया
आरज़ू के गुल मुस्कुराने लगे
जैसे गुलशन में बहार आ गया
तिश्न नज़रें मिली शोख नज़रों से जब
मैं बरसने लगी जाम भरने लगे
साक़िया आज तेरी ज़रूरत नहीं
बिन पिये बिन पिलाये खुमार आ गया
रात सोने लगी सुबह होने लगी
शम्म बुझने लगी दिल मचलने लगे
वक़्त की रोश्नी में नहायी हुई
ज़िन्दगी पे अजब स निखार आ गया
Tuesday, 15 July 2014
A Beautiful Ghazal by "Ali Sardar Zafari"
मेरी वादी में वो इक दिन यूँ ही आ निकली थी
रंग और नूर का बहता हुआ धारा बन कर
महफ़िल-ए-शौक़ में इक धूम मचा दी उस ने
ख़ल्वत-ए-दिल में रही अन्जुमन-आरा बन कर
शोला-ए-इश्क़ सर-ए-अर्श को जब छूने लगा
उड़ गई वो मेरे सीने से शरारा बन कर
और अब मेरे तसव्वुर का उफ़क़ रोशन है
वो चमकती है जहाँ ग़म का सितारा बन कर
रंग और नूर का बहता हुआ धारा बन कर
महफ़िल-ए-शौक़ में इक धूम मचा दी उस ने
ख़ल्वत-ए-दिल में रही अन्जुमन-आरा बन कर
शोला-ए-इश्क़ सर-ए-अर्श को जब छूने लगा
उड़ गई वो मेरे सीने से शरारा बन कर
और अब मेरे तसव्वुर का उफ़क़ रोशन है
वो चमकती है जहाँ ग़म का सितारा बन कर
Sunday, 15 June 2014
वेद में जिनका हवाला हाशिए पर भी नहीं
A thought provoking poem by Hindi poet "Adam Gondvi"
वेद में जिनका हवाला हाशिए पर भी नहीं
वे अभागे आस्था विश्वास ले कर क्या करें
लोकरंजन हो जहाँ शंबूक-वध की आड़ में
उस व्यवस्था का घृणित इतिहास ले कर क्या करें
कितना प्रगतिमान रहा भोगे हुए क्षण का इतिहास
त्रासदी, कुंठा, घुटन, संत्रास ले कर क्या करें
बुद्धिजीवी के यहाँ सूखे का मतलब और है
ठूँठ में भी सेक्स का एहसास ले कर क्या करें
गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे
पारलौकिक प्यार का मधुमास ले कर क्या करें
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