Sunday, 15 September 2013
Friday, 6 September 2013
KENCHUL (THE MOULT)
जन्म से ही चढ़ने लगी केंचुल
एक के ऊपर एक
चमकदार और पारदर्शी
प्रफुल्लित हो नाच उठता, मैं
गर्व से इठलाता हुआ
सीना चौड़ा किये खुश होता
अपने हर नए आवरण के साथ
सत्य से दूर होता गया
जैसे जैसे मेरे ऊपर चढ़ती गयीं
केंचुल की परतें
मेरे चारों ओर लोग ताली बजाते हैं
तालियाँ तेज़ हो जाती हैं
मेरे हर नयी केंचुल के साथ
भीड़ का हिस्सा बना, मैं खड़ा देखता जाता हूँ
अपने रंग को बदलता हुआ
उस भीड़ की तरह जो खड़ी ताली बजा रही है
मेरे ऊपर चढ़ती हर एक नयी केंचुल को देखकर
जो केंचुल कभी पारदर्शी थी
वो अब मटमैली हो चुकी है
इतनी परतों के बाद
बाधित कर देती है, मेरी दृष्टि
और मैं असमर्थ पाता हूँ
कुछ भी स्पष्ट देख सकने में
केंचुल के पार
एक नहीं कई केंचुल हैं
एक के ऊपर एक
उतारा है कुछ केंचुलों को मैंने
लेकिन अब भी अनभिज्ञ हूँ
अपने सत्य से
व्यग्र हो उठता है मन
तड़पता है निकल आने को बाहर
इन केंचुलों के कारागार से
इस घुटन से दूर चाहता है उड़ना
उन्मुक्त आकाश में
केंचुलों की परिधि से परे
जानने को सत्य, जो छुपा है
उतार रहा हूँ
एक के बाद एक अपनी केंचुल को
उस दीवार के पत्थरों से रगड़ रगड़ के
जो ताली बजाते लोगों ने खड़ी की है
लेकिन शायद वो खुश नहीं हैं
लहूलुहान हो जाता हूँ मैं
कुछ अपनी रगड़ से
और कुछ उनके पत्थरों से
जो अब तक ताली बजा रहे थे
आसानी से छूटती नहीं है ये केंचुल
जिसने जमा ली हैं जड़ें मेरे भीतर तक
अधमरा लेटा रहता हूँ
घाव भरने के इंतज़ार में
फिर तैयार होता हूँ, मैं
एक और केंचुल की परत, उतारने के लिए
Sunday, 13 January 2013
EK AUR LAU BUJH GAYI
After horrific rape incident in Delhi wanted to show my grief and pain. This poem is an effort to look inside our hearts and ask some questions.
एक और लौ बुझ गयी मैं बस देखता रहा
बाहर से चुप खड़ा था अन्दर से चीखता रहा
अनजाने डर ने बाँध दिए थे मेरे कदम
कायरता से मेरा साहस व्यर्थ में लड़ता रहा
कोई तो आ जाएगा उस खून से लथपथ के पास
सोचकर यही मैं अपने रास्ते बढ़ता रहा
एक और लौ बुझ गयी मैं बस देखता रहा
बाहर से चुप खड़ा था अन्दर से चीखता रहा
उन दम तोड़ती साँसों की मद्धम आवाज़
मेरे बहरेपन में कहीं गुम हो गयी
छटपटाता देख उसको यूँ सड़क के किनारे
मेरी आँखों का पर्दा और भी गहराता रहा
एक और लौ बुझ गयी मैं बस देखता रहा
बाहर से चुप खड़ा था अन्दर से चीखता रहा
अब पिघलता ही नहीं सामने हो कोई भी मंज़र
दिल को अपने किस कदर मैं पत्थर बनाता रहा
अपनी नज़रों में गिरने पे होती नहीं शर्मिंदगी
इंसान कैसा बन गया हूँ सवाल ये दोहराता रहा
एक और लौ बुझ गयी मैं बस देखता रहा
बाहर से चुप खड़ा था अन्दर से चीखता रहा
Sunday, 11 November 2012
QAID (IMPRISONMENT)
किस कैद में जकड़ता जा रहा हूँ
मैं खुद से ही बिछड़ता जा रहा हूँ
जो ओझल हो गए आँखों से
उन ख्वाबों को पकड़ता जा रहा हूँ
दुनिया के सामने फ़ैलने की चाह में
कितना खुद में सिमटता जा रहा हूँ
मुठ्ठी भर ख़ुशी पर हक क्या जता दिया
दर्द से रिश्ता बनाता जा रहा हूँ
एक दिन तो फूल मिलेंगे राहों में
बस यूँ ही पत्थर हटाता जा रहा हूँ
तुम्हारा ये कहना कि आओगे लौटकर
साँसों से भी रिश्ता निभाता जा रहा हूँ
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