Sunday, 15 September 2013

बस यूँ ही

 

जब भी शाम गहराती है

तेरी याद आ जाती है... बस यूँ ही

मेरा कोई इरादा नहीं होता

फिर भी सता जाती है ... बस यूँ ही

तेरे मुरीद हम नहीं हैं

हक अपना जताती है ... बस यूँ ही

लाख कर लूँ बंद दरवाजे दिल के

चुपके से घर बना जाती है ... बस यूँ ही

 

तेरे हाथों में खंजर तो नहीं दिखता

मैं फ़ना हो जाता हूँ ... बस यूँ ही

दिल की लगी को दिल्लगी समझते हो

कभी दिल भी लगाओ ... बस यूँ ही

कब से साकी बने बैठे हो

कभी शराब भी बन जाओ ... बस यूँ ही

 

 

 

 

 

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